Police Par Bharosa Karen

ऐतिहासिक सनद:

Date:

Shankaracharya #prayagraj #parampara #Sanatandharma

ज्योतिष्पीठ शंकराचार्य की पालकी-मर्यादा और पेशवाओं का धर्म-रक्षण
-स्वामी प्र.चै.मुकुन्दानन्द गिरि

आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठ सहित चारों आम्नाय पीठों की मर्यादा सनातन धर्म की अखंडता का आधार है। यहाँ ‘पालकी’ (विशेषकर क्षैतिज-पालकी), छत्र और चामर का अधिकार केवल एक राजकीय वैभव नहीं, बल्कि उस धर्मसत्ता की संप्रभुता का प्रतीक है, जिसे मुगलों ने खंडित करने का कुप्रयास किया और पेशवाओं ने अपने शौर्य से पुनः स्थापित किया।
कालगणना और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यदि हम इस संबंध की गहराई को गणना की दृष्टि से देखें, तो 18वीं शताब्दी का मध्य काल सनातन के पुनरुत्थान का स्वर्ण युग था। फरवरी 1735 ई. में जब पेशवा बाजीराव प्रथम की माता राधाबाई उत्तर भारत की तीर्थयात्रा पर निकलीं, तभी से पेशवाओं ने मुग़ल सम्राट और स्थानीय नवाबों को यह स्पष्ट संदेश दे दिया था कि हिंदू धर्माचार्यों की मर्यादा में बस कुछ क्षण का भी व्यवधान मराठा साम्राज्य को स्वीकार्य नहीं होगा। यह उस ऐतिहासिक रक्षा-सूत्र का प्रारंभ था, जो समय बीतने के साथ और अधिक सुदृढ़ होता गया।
1751 की विजय और प्रयाग की मुक्ति
इस श्रृंखला की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मई 1751 ई. में जुड़ी, जब पेशवा नाना साहब (बालाजी बाजीराव) ने अपनी सैन्य शक्ति से फर्रुखाबाद के नवाब अहमद खां बंगश को धूल चटाई। इस विजय के उपरांत जो संधि हुई, उसने प्रयाग और काशी को मुग़ल सूबेदारों के चंगुल से मुक्त कराया। इसी समय एक ऐतिहासिक ‘सनद’ जारी की गई, जिसमें ज्योतिष्पीठ के आचार्यों की ‘पालकी मर्यादा’ को अक्षुण्ण रखने का लिखित वचन दिया गया था। इसमें स्पष्ट उल्लेख था कि जगद्गुरु की सवारी अपनी प्राचीन रीति के अनुसार ही चलेगी और कोई भी यवन अधिकारी इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा।
अन्ताजी मानकेश्वर जो दिल्ली दरबार में मर्यादा के प्रहरी बने।
जुलाई 1754 ई. के आसपास, दिल्ली में पेशवा के मुख्य सेनापति और कूटनीतिज्ञ अन्ताजी मानकेश्वर ने धर्म-रक्षा की एक नई इबारत लिखी। जब मुग़ल अधिकारियों ने सन्यासियों के ‘छत्र-चामर’ और ‘क्षैतिज-पालकी’ पर आपत्ति उठाई, तब अन्ताजी ने सैन्य कूटनीति का ऐसा प्रयोग किया कि मुग़ल दरबार को झुकना पड़ा। SPD Vol. 21, पत्र क्रमांक 61 के अनुसार, अन्ताजी ने कड़े शब्दों में चेतावनी दी थी कि *जगद्गुरु की पालकी का अपमान स्वयं पेशवा का अपमान माना जाएगा। *अन्ताजी की कार्यशैली में ‘शासु अनुशिष्टौ’ (अनुशासन करना) का भाव स्पष्ट था, जहाँ उन्होंने राजसत्ता को धर्मसत्ता के अनुशासन में रहने को विवश कर दिया।
मुग़ल अवरोध और मर्यादा पर प्रहार
18वीं शताब्दी में, जब मुग़ल सत्ता अपनी जड़ता और कट्टरता के चरम पर थी, उन्होंने हिंदू धर्माचार्यों की इस राजकीय गरिमा को खंडित करने का कुप्रयास किया।
तीर्थ-कर (Pilgrimage Tax)
प्रयाग संगम पर स्नान के लिए हिंदुओं से ‘जज़िया’ के समान अपमानजनक कर वसूला जाता था।
मर्यादा पर प्रतिबंध
मुग़ल अधिकारियों ने ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य की ‘क्षैतिज-पालकी’ और उनके ‘छत्र-चामर’ के प्रदर्शन पर रोक लगा दी थी। उनका उद्देश्य धर्मसत्ता को राजसत्ता के अधीन दिखाना था।
ऐतिहासिक लेख-पत्र और सनद
साक्ष्यों की जुबानी में यदि हम ‘कल संख्याने’ (गणना) की दृष्टि से देखें, तो पुणे के ‘पेशवा दफ्तर’ (SPD) में ऐसे अनेक पत्र हैं जो इस मर्यादा को पुष्ट करते हैं । SPD Vol. 2, पत्र क्रमांक 66 पत्र में पेशवा की माता राधाबाई की उत्तर भारत यात्रा और प्रयाग-काशी में ‘तीर्थ कर’ की समाप्ति के प्रयासों का वर्णन है।

सनद (1751 ईस्वी) में अहमद खां बंगश को परास्त करने के बाद पेशवा ने जो संधि की, उसके तहत प्रयाग को मुग़ल सूबेदारों के चंगुल से मुक्त कराया गया। इस सनद में स्पष्ट उल्लेख है: “जगद्गुरुंची पालखी व लवाजमा यांची मर्यादा प्राचीन रीतीप्रमाणे चालावी” (जगद्गुरु की पालकी और लवाजमा की मर्यादा प्राचीन रीति के अनुसार चलनी चाहिए)।
मराठी शब्दावली में ‘लवाजमा’ (Lavajama) शब्द का प्रयोग अत्यंत व्यापक और गौरवपूर्ण अर्थों में किया जाता है। यह मूलतः अरबी शब्द ‘लवाज़िम’ का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है ‘आवश्यक वस्तुएँ’ या ‘अनिवार्य उपकरण’।
परंतु ऐतिहासिक और राजकीय संदर्भ में, विशेषकर पेशवा कालीन ‘सनदों’ में इसका अर्थ निम्नलिखित है:

  1. राजकीय साज-ओ-सामान (Regalia)
    जब किसी महान व्यक्तित्व या धर्माचार्य की सवारी निकलती है, तो उनके सम्मान में जो राजकीय चिह्न साथ चलते हैं, उन्हें ‘लवाजमा’ कहा जाता है। इसमें निम्नलिखित वस्तुएँ सम्मिलित होती हैं:
  • छत्र और चामर: सर्वोच्च सत्ता के प्रतीक।
  • अब्दागीर: सूर्य की किरणों से बचाने वाला विशेष राजकीय छाता।
  • निशान और ध्वज: धर्म या राज्य के प्रतीक चिन्ह।
  • छड़ी और भाले: जिन्हें ‘भालदार’ और ‘चोपदार’ लेकर चलते हैं।
  1. अनुचर और अंगरक्षक (Retinue/Entourage)
    ‘लवाजमा’ केवल निर्जीव वस्तुओं का नाम नहीं है, बल्कि उन व्यक्तियों का समूह भी है जो इस मर्यादा को धारण करते हैं।
  • ज्योतिष्पीठ के संदर्भ में, इसमें सन्यासी, ब्रह्मचारी, अंगरक्षक, वाद्य यंत्र बजाने वाले और पालकी उठाने वाले—सभी ‘लवाजमा’ का हिस्सा माने जाते हैं।
  1. मर्यादा और प्रोटोकॉल
    मराठी दस्तावेजों में जब कहा जाता है कि “जगद्गुरुंचा लवाजमा”, तो इसका सीधा अर्थ होता है—”जगद्गुरु की वह पूर्ण मर्यादा जिसे राजकीय मान्यता प्राप्त है।” यह इस बात की पुष्टि करता है कि संबंधित व्यक्ति का पद एक सम्राट के तुल्य है।
    ऐतिहासिक सनद में इसका महत्व
    जैसा कि हमने चर्चा की, मई 1751 ई. की सनद में जो उल्लेख है— “जगद्गुरुंची पालखी व लवाजमा”—उसका अर्थ यही था कि पेशवाओं ने मुगलों को यह स्पष्ट कर दिया था कि शंकराचार्य के साथ चलने वाला एक-एक व्यक्ति और एक-एक राजकीय चिह्न (छत्र-चामर आदि) पूर्णतः सुरक्षित और सम्मानित रहेगा।

अन्ताजी मानकेश्वर का पत्र (1754 ईस्वी) में दिल्ली से पेशवा को लिखे पत्र में अन्ताजी ने स्पष्ट किया— “यवन (मुग़ल) सन्याशांच्या पालखीस अटकाव करितात, त्यांस शासन करणे अगत्य आहे” (मुग़ल सन्यासियों की पालकी को रोकते हैं, उन्हें दण्ड देना अनिवार्य है)।
प्रयाग का ऐतिहासिक ‘सहज स्नान’ और अन्ताजी का रोल
प्रयाग के घाटों पर जब मुग़ल अधिकारियों ने ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य जी की पालकी को रोकने की धृष्टता की, तब अन्ताजी मानकेश्वर ने अपनी सेना को स्पष्ट आदेश दिया। अन्ताजी के पत्रों के अनुसार:
“आम्ही दिल्लीच्या तख्तासमोर नमलो नाही, तर जगद्गुरुंच्या पालखीचा अपमान कसा खपवून घेणार? पालखी संगमपर्यंत निर्विघ्न जाईल, अन्यथा तलवार बोलेल।”
(अर्थात्: हम दिल्ली के तख्त के सामने नहीं झुके, तो जगद्गुरु की पालकी का अपमान कैसे सहेंगे? पालकी संगम तक निर्विघ्न जाएगी, अन्यथा तलवार बोलेगी।)
मुग़ल अधिकारी, जो कर और प्रोटोकॉल की बात कर रहे थे, मराठा तोपों के सामने बस कुछ क्षण भी खड़े होने का साहस नहीं कर सके। अन्ताजी ने सुनिश्चित किया कि ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य अपनी पूर्ण मर्यादा (पालकी, छत्र, चामर) के साथ संगम के जल तक पहुँचें। यह ‘सहज स्नान’ सनातन की संप्रभुता की घोषणा थी। (1750-60 के दशक के
इस कालखंड के दौरान जब ज्योतिष्पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी रामकृष्ण तीर्थ जी प्रयाग संगम स्नान के लिए पधारे, तब मुग़ल सूबेदारों ने अपनी कुटिलता से उनकी पालकी को रोकना चाहा। उस समय पेशवा के आदेश पर दत्ताजी शिंदे और मल्हारराव होल्कर ने अपनी सशस्त्र टुकड़ियों को संगम तट पर तैनात कर दिया। मराठा तोपखाने के भय से मुग़ल सैनिक पीछे हट गए और ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य जी ने पूर्ण राजकीय वैभव, क्षैतिज-पालकी और छत्र-चामर के साथ संगम में प्रवेश किया। इस प्रसंग को इतिहास में ‘सहज स्नान’ के नाम से जाना जाता है, जो आज भी ज्योतिष्पीठ की सर्वोच्चता का प्रमाण है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ‘परमाराध्य’ का मर्यादा-रक्षण उसी इतिहास की चेतना का पुनर्जागरण है। सिद्धान्त है कि इतिहास स्वयं को दोहराता है। वर्तमान में, जब प्रशासन ज्योतिष्पीठ की प्राचीन मर्यादाओं और पालकी के प्रोटोकॉल में बाधा डालता है, तब परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानंदः सरस्वती ‘1008’ का अडिग रुख उसी 18वीं शताब्दी की पेशवा कालीन चेतना का जीवंत रूप है। जिस प्रकार अन्ताजी मानकेश्वर ने दिल्ली के दरबार में शास्त्र-मर्यादा के लिए शस्त्र का समर्थन लिया, आज परमाराध्य अपने तप और सत्याग्रह से उसी ‘क्षैतिज-पालकी’ और ‘छत्र-मर्यादा’ को जीवंत रख रहे हैं।
यह स्पष्ट है कि ज्योतिष्पीठ की पालकी की रक्षा केवल एक परंपरा का निर्वाह नहीं, बल्कि सनातन की संप्रभुता और गरिमा की रक्षा है। मुगलों द्वारा लगाई गई रोक को जिस प्रकार पेशवाओं ने खंडित किया था, आज उसी मर्यादा को अक्षुण्ण रखना प्रत्येक सनातनी का परम धर्म है।

यदि हम इस मर्यादा रक्षा को नहीं उठे तो यह निरूपित रहेगा कि मुगल जिस पालकी की मर्यादा न तोड सके उस पालकी की मर्यादा तथाकथित हिन्दू राज्य में खंडित हुई और सच्चे सनातनियों का पराक्रम प्रसुप्त ही रहा। जो कि एक कलंक होगा।
यह लेख इस बात का साक्षी है कि ज्योतिष्पीठ की पालकी कोई सामान्य सवारी नहीं, बल्कि ‘अखंड धर्म-साम्राज्य’ की पहचान है। मुगलों द्वारा लगाया गया प्रतिबंध कल भी अधर्म था और आज की बाधाएँ भी उसी मानसिकता का विस्तार हैं।

The News Channel
The News Channel
ANAND SRIVASTAVA--DIRECTOR & CHIEF EDITOR....NOMINI--PADAMBHUSHAN AWARD-2012, PADAMVIBHUSHAN AWADRD -2017..

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

प्रेस विज्ञप्ति

विषय: प्रेस विज्ञप्ति: गौ-वंश वध और 'वेतन बनाम वैराग्य'...

प्रेस विज्ञप्ति-533 दिनांक: 09.02.2026 अंतर विभागीय क्रिकेट टूर्नामेंट, डीआरएम कप...

विज्ञान मॉडल प्रदर्शनी में दिखी बच्चों की नवाचार क्षमता

जनपद स्तरीय विज्ञान मॉडल प्रदर्शनी से बच्चों में बढ़ी...