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Aravalli Hills: सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा से गरमाई राजस्थान की सियासत, क्या पर्यावरण से आगे बढ़ेगा राजनीतिक टकराव?

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अरावली पर्वतमाला को लेकर एक बार फिर राजस्थान में राजनीतिक और पर्यावरणीय बहस तेज हो गई है। Supreme Court of India द्वारा अरावली की नई वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार किए जाने के बाद राज्य में सियासी हलचल मच गई है। इस मुद्दे पर जहां कांग्रेस पहले से मुखर है, वहीं अब सत्तारूढ़ बीजेपी के भीतर से भी सवाल उठने लगे हैं। इससे संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में यह मामला सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजस्थान की राजनीति में नए समीकरण भी बना सकता है।


बीजेपी के भीतर असहजता, कांग्रेस पहले से आक्रामक

कांग्रेस ‘सेव अरावली’ अभियान के जरिए सरकार पर हमलावर है। अभियान की कमान पूर्व मुख्यमंत्री Ashok Gehlot संभाल रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि अब बीजेपी के वरिष्ठ नेता भी सरकार की रणनीति पर सवाल उठा रहे हैं। पूर्व कैबिनेट मंत्री Rajendra Rathore ने साफ कहा है कि सरकार को इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करनी चाहिए।


18 साल बाद फिर क्यों उठा अरावली विवाद?

करीब 18 वर्षों बाद अरावली को लेकर विवाद दोबारा चर्चा में है। हालिया सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस वैज्ञानिक परिभाषा को मान्यता दी है, जिसके अनुसार:

  • जिस भू-भाग की ऊंचाई आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर अधिक होगी, वही ‘अरावली हिल’ मानी जाएगी।
  • 500 मीटर के दायरे में स्थित दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों को ‘अरावली रेंज’ की श्रेणी में रखा जाएगा।

केंद्र सरकार का तर्क है कि इससे पूरे देश में अरावली की एक समान और स्पष्ट पहचान तय हो सकेगी।


कितनी अरावली संरक्षण से बाहर हो सकती है?

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली केवल ऊंचाई नहीं, बल्कि एक पूरा पारिस्थितिक तंत्र है। सरकारी व तकनीकी अध्ययनों के अनुसार राजस्थान में अरावली की लगभग 90% पहाड़ियां 100 मीटर की शर्त पर खरी नहीं उतरतीं
इसका मतलब यह है कि राज्य की केवल 8–10% पहाड़ियां ही कानूनी रूप से अरावली मानी जाएंगी, जबकि बाकी पहाड़ियां पर्यावरणीय संरक्षण से बाहर जा सकती हैं।


पर्यावरणीय खतरे क्यों गंभीर हैं?

राजस्थान में अरावली वर्षा जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज, धूल भरी आंधियों को रोकने और थार रेगिस्तान के विस्तार को थामने में अहम भूमिका निभाती है। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि यदि छोटी और मध्यम ऊंचाई की पहाड़ियां संरक्षण से बाहर हुईं तो:

  • अलवर, जयपुर, दौसा, सीकर, झुंझुनूं, उदयपुर जैसे जिलों में भूजल स्तर और गिरेगा
  • सूखा और गर्मी की तीव्रता बढ़ेगी
  • खनन और अनियंत्रित निर्माण को बढ़ावा मिलेगा

यह स्थिति पर्यावरण के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संकट को जन्म दे सकती है।


राजनीति बनाम पर्यावरण का सवाल

केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री Bhupender Yadav ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा कि अशोक गहलोत के कार्यकाल में 2002 में भूमि सुधार से जुड़ी रिपोर्ट पेश की गई थी और अब वही इस मुद्दे पर विरोध कर रहे हैं। बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस इसे राजनीतिक मुद्दा बना रही है, जबकि कांग्रेस का कहना है कि यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है।


अरावली: सिर्फ पहाड़ नहीं, ‘ग्रीन वॉल’

अरावली पर्वतमाला राजस्थान के लगभग 15 जिलों से होकर गुजरती है और इसे दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में गिना जाता है। इसमें किले, महल, मंदिर, शहर और 10 से ज्यादा वन्यजीव अभयारण्य शामिल हैं।
विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों का मानना है कि एक बार अगर ये पहाड़ कट गए और जलधाराएं टूट गईं, तो नुकसान स्थायी होगा, जिसकी भरपाई सदियों में भी संभव नहीं।


निष्कर्ष

अरावली को लेकर छिड़ी यह बहस अब अदालत और सरकार से निकलकर समाज और राजनीति के केंद्र में आ चुकी है। सवाल सिर्फ परिभाषा का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। आने वाले समय में यह मुद्दा राजस्थान की राजनीति में बड़े बदलावों का कारण बन सकता है।

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