ख़ामोश हो गया पत्रकारिता का सच्चा स्वर—राघवेंद्र मिश्रा अब हमारे बीच नहीं
*कैंसर से जूझते हुए भी कलम नहीं थमी,अंतिम सांस तक निभाया पत्रकारिता का धर्म
बारा, प्रयागराज। कुछ लोग सिर्फ पेशा नहीं चुनते,वे उसे अपना जीवन बना लेते हैं।इलेक्ट्रॉनिक मीडिया क्लब प्रयागराज के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र मिश्रा ऐसे ही विरले व्यक्तित्व थे,जिनका मंगलवार की रात एक निजी अस्पताल में निधन हो गया।उनके जाने के साथ ही पत्रकारिता की दुनिया ने अपना एक सच्चा सिपाही, एक निर्भीक आवाज़ और एक संवेदनशील मन खो दिया। लंबे समय से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझते हुए भी राघवेंद्र मिश्रा की आत्मा कभी कमजोर नहीं पड़ी। शरीर थकता रहा,पर उनका संकल्प अडिग रहा। पीड़ा के उन असहनीय पलों में भी वे कहते रहे— “बस थोड़ा ठीक हो जाऊँ, फिर फील्ड में लौटना है।” यही जज़्बा उन्हें साधारण पत्रकार से असाधारण बना देता है। महाकुंभ जैसे विराट धार्मिक आयोजन में उन्होंने बीमारी की परवाह किए बिना सक्रिय रिपोर्टिंग कर यह साबित कर दिया कि पत्रकारिता उनके लिए नौकरी नहीं, बल्कि साधना थी।उनके निधन की खबर फैलते ही मीडिया जगत में शोक की गहरी लहर दौड़ गई। बुधवार को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया क्लब द्वारा आयोजित वर्चुअल शोकसभा में माहौल गमगीन था, हर चेहरा उदास और हर आवाज़ भर्राई हुई। क्लब के संस्थापक एवं संयोजक वीरेंद्र पाठक ने भावुक होते हुए कहा कि राघवेंद्र मिश्रा ईमानदारी,निष्ठा और शब्दों की मर्यादा के प्रतीक थे। वे संस्कृत के गहरे ज्ञाता थे,उनकी भाषा में गरिमा थी और विचारों में सच्चाई। उनके शब्द सिर्फ खबर नहीं होते थे, वे समाज को दिशा देने का प्रयास होते थे। शोकसभा में पूर्व अध्यक्ष दिनेश तिवारी,राजेंद्र गुप्ता,पवन मिश्रा,पूर्व सचिव कुलदीप शुक्ला,आरव भारद्वाज,मोहम्मद लईक,विकास मिश्रा, सौरभ पंडित, मोहम्मद आरिज, भेलचंद पांडे,विशाल श्रीवास्तव, राकेश पांडे, पीयूष पांडे, रचना द्विवेदी,डॉ. जैदुल्लाह, डॉ. शमशाद खान,अभिषेक गुप्ता,राज हेमांशू सागर, उमेश सहित अनेक पत्रकारों ने अपने-अपने शब्दों में उन्हें याद किया। हर संस्मरण के साथ आँखें नम होती गईं और दिल भारी। सभा में दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। उस मौन में सिर्फ सन्नाटा नहीं था,बल्कि एक ऐसे योद्धा की याद थी जिसने सच की मशाल थामे रखी, चाहे हालात कितने ही कठिन क्यों न रहे हों। ईश्वर से प्रार्थना की गई कि वे शोकाकुल परिवार को इस असहनीय दुख को सहने की शक्ति दें। राघवेंद्र मिश्रा भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से न हों, लेकिन उनकी ईमानदारी,उनका संघर्ष और पत्रकारिता के प्रति उनका जुनून आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा। आज पत्रकारिता रो रही है… और उसकी आंखों में एक ऐसा आंसू है, जो शब्दों में समा पाना मुश्किल है।



