सतुआ बाबा उर्फ संतोष दास जी महाराज. ये वो संत जो हमेशा पीला कपड़े में दिखाई देते हैं, अक्सर सीएम योगी आदित्यनाथ के अगल बगल दिखाई देते हैं और आजकल महंगी कारों को लेकर मीडिया और सोशल मीडिया में छाए हुए हैं. बहुत से लोग सतुआ बाबा के बारे में ये जानते हैं कि वो काशी के रहने वाले सीएम योगी के क़रीबी संत हैं. लेकिन सतुआ बाबा की कहानी सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं है.
सतुआ बाबा पीठ का इतिहास क्या है?
काशी के मणिकर्णिका घाट पर दूर से दिखने वाली एक इमारत सतुआ बाबा का स्थायी आश्रम है. इस पीठ की स्थापना साल 1803 में हुई थी. ये पीठ गुजरात के रहने वाले संत जेठा पटेल ने की थी. जेठा पटेल संत बन गए थे और काशी आकर उन्होंने जिस आश्रम की स्थापना की, उस आश्रम के मुखिया को सतुआ बाबा कहते हैं. इस आश्रम में बटुकों को वैदिक शिक्षा दी जाती है. आज उसी पीठ के मुखिया संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा हैं.
बाबा का इतिहास क्या है?
संतोष दास यूपी के सीमावर्ती ललितपुर ज़िले के साधारण ब्राह्मण परिवार से आते हैं. मात्र 11 साल की उम्र में परिवार छोड़ वो काशी आ गए. काशी में उनका जुड़ाव सतुआ बाबा से हो गए. वैष्णव संप्रदाय के निर्मोही अखाड़े से जुड़े इस पीठ के मुखिया ने संतोष दास की प्रतिभा देख उन्हें अपना उत्तराधिकारी बना दिया. संतोष दास मात्र 19 साल की उम्र में महामंडलेश्वर बन गए. ये अबतक के इतिहास में सबसे कम उम्र में दी गई महामंडलेश्वर की उपाधि थी.
सबसे कम उम्र में बड़े पद मिले
सबसे कम उम्र में महामंडलेश्वर बनने वाले संतोष दास के गुरु के साकेतवासी होने के बाद उनके उत
कैसे चर्चा शुरू हुई?
प्रयागराज में माघ मेले की तैयारी चल रही थी. प्रयागराज के ज़िलाधिकारी सतुआ बाबा के आश्रम पहुंचे और बाबा के लिए रोटी सेंकने लगे. वीडियो आग की तरह वायरल हो गया. दो दिन बाद डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या माघ मेले में पहुंचे तो डीएम को हिदायत देते हुए कहा कि सतुआ बाबा की रोटी के चक्कर में पड़ने की जगह काम करें. इसके बाद सीएम योगी जब माघ मेले में पहुंचे तो उन्होंने मंच से जो कहा उसने सबको हैरान कर दिया. सीएम ने कहा कि आप सभी लोग सतुआ बाबा से जुड़ जाइए. जो नहीं जुड़ेगा, उसे भी आख़िरी में वहीं जाना है, जहां सतुआ बाबा रहते हैं. यानी काशी की मणिकर्णिका घाट.



